अगर आज वर्कआउट करने का बिल्कुल मन नहीं है, तो मोटिवेशन आने का इंतज़ार न करें। वर्कआउट को इतना छोटा कर दें कि वह लगभग बहुत आसान लगे, अगले कुछ मिनटों में शुरू करें और काम को ख़ुद मोटिवेशन पैदा करने दें। जूते पहनें, दो मिनट हिलें-डुलें, और उसके बाद तय करें कि आगे करना है या नहीं। ज़्यादातर बार आप करेंगे।

मोटिवेशन एक एहसास है, और एहसास आते-जाते रहते हैं। जो लोग सालों से ट्रेनिंग करते हैं, वे आपसे ज़्यादा मोटिवेटेड नहीं हैं; वे ऐसे रूटीन और छोटे नियमों पर भरोसा करते हैं जो सुस्त दिनों में भी काम करते हैं। यहाँ जानिए कि आज का दिन कैसे निकालें और अगला सुस्त दिन कैसे आसान बनाएँ।

अभी: 5 कदम का रेस्क्यू प्लान

  1. उम्मीद कम करें। ख़ुद से कहें कि बस दो मिनट करने हैं। पूरा वर्कआउट नहीं, सिर्फ़ दो मिनट।
  2. वर्कआउट के कपड़े पहन लें। सुनने में मामूली है, लेकिन इससे सोच "करूँ या नहीं?" से बदलकर "मैं कर रहा हूँ" हो जाती है।
  3. किसी आसान चीज़ से शुरू करें। जगह पर मार्च करें, कंधे घुमाएँ, दस धीमे स्क्वाट करें। बर्पी (Burpee) से शुरुआत न करें।
  4. 10 मिनट का टाइमर लगाएँ। नीचे दिया रूटीन करें। टाइमर बजे तो आप रुक सकते हैं।
  5. इसे लॉग करें। 10 मिनट का सेशन भी वर्कआउट है। लिख लेने से काम पूरा होने का एहसास होता है और आपकी स्ट्रीक बची रहती है।

10 मिनट का "मिनिमम वर्कआउट"

बिना किसी उपकरण के, फ़्लैट के लिए काफ़ी शांत और आसानी से बदला जा सकता है। हर एक्सरसाइज़ 40 सेकंड करें, 20 सेकंड आराम करें, और पूरा सर्किट दो बार करें।

  • जगह पर मार्च या जॉगिंग: बाँहें झुलाएँ, आराम से साँस लें
  • बॉडीवेट स्क्वाट (Squat): ऐसे पीछे बैठें जैसे कुर्सी पर बैठ रहे हों, छाती ऊपर, एड़ियाँ ज़मीन पर
  • इनक्लाइन पुश-अप (Incline push-up): हाथ मेज़ या किचन काउंटर पर, शरीर एक सीधी लाइन में
  • ग्लूट ब्रिज (Glute bridge): पीठ के बल लेटें, पैर ज़मीन पर, नितंबों को कसकर कूल्हे ऊपर उठाएँ
  • प्लैंक (Plank): कोहनियों पर; ज़रूरत हो तो घुटने टिका लें

ये हुए 10 मिनट। अगर पहले राउंड के बाद अच्छा लगे, तो तीसरा राउंड जोड़ दें। अगर अब भी सुस्ती है, तो बिना अपराधबोध के रुक जाएँ: आपने आदत को ज़िंदा रखा, और मुश्किल दिनों में यही मायने रखता है। जब ज़्यादा एनर्जी हो, तो हमारा 15 मिनट का होम वर्कआउट आज़माएँ।

मोटिवेशन क्यों गायब हुआ

वजह पता हो तो सही हल चुनना आसान हो जाता है।

आप थके हैं या नींद पूरी नहीं हुई

असली थकान एक संकेत है, कमज़ोरी नहीं। ऐसे दिनों में हल्का सेशन, टहलना या थोड़ी स्ट्रेचिंग अच्छा विकल्प है। अगर ज़्यादातर दिन थकान रहती है, तो पहले अपनी नींद देखें।

प्लान बहुत मुश्किल है

अगर हर वर्कआउट आपको पूरी तरह निचोड़ देता है, तो दिमाग़ उससे बचना सीख जाता है। सेशन छोटे या आसान करें ताकि आप यह महसूस करते हुए ख़त्म करें कि थोड़ा और कर सकते थे। बहुत जल्दी बहुत ज़्यादा करना शुरुआती लोगों की आम गलतियों में से एक है।

आप बोर हो गए हैं

महीनों तक एक ही रूटीन उबाऊ हो जाता है। एक चीज़ बदलें: नई एक्सरसाइज़, अलग फ़ॉर्मेट जैसे सेट की जगह इंटरवल, या दिन का अलग समय।

प्रोग्रेस नहीं दिख रही

जब कुछ बदलता नहीं दिखता, तो मेहनत बेकार लगती है। उन चीज़ों को ट्रैक करें जो जल्दी सुधरती हैं, जैसे पुश-अप के रेप्स या प्लैंक का समय। हमारी गाइड फिटनेस प्रोग्रेस कैसे ट्रैक करें इसका तरीका बताती है।

ज़िंदगी बहुत व्यस्त है

ऑफ़िस का तनाव, परिवार की ज़िम्मेदारियाँ, एक ख़राब हफ़्ता। यह सामान्य है। जब तक चीज़ें शांत न हों, हफ़्ते में दो-तीन छोटे सेशन वाले "मेंटेनेंस" प्लान पर आ जाएँ।

आदतें जो मोटिवेशन से जीतती हैं

एक बार तय करें, रोज़ नहीं

तय दिन और तय समय चुनें, जैसे "सोमवार, बुधवार, शुक्रवार, काम के बाद"। जब फ़ैसला पहले से हो चुका हो, तो रोज़ ख़ुद से बहस नहीं करनी पड़ती।

अगर-तो वाले प्लान बनाएँ

एक आसान नियम लिख लें: "अगर घर पहुँचकर बहुत थकान लगी, तो छोड़ने की बजाय 10 मिनट वाला वर्कआउट करूँगा।" ख़राब दिन के लिए पहले से प्लान होने पर हार मानने की संभावना बहुत कम हो जाती है।

शुरू करना आसान बनाएँ

मैट बिछा रहने दें या नज़र के सामने रखें। वर्कआउट के कपड़े बिस्तर के पास रख दें। हर छोटी रुकावट हटाने से शुरुआत की संभावना बढ़ती है।

चेन टूटने न दें

ट्रेनिंग वाले दिनों की लगातार लाइन देखकर उसे न तोड़ने का हल्का दबाव बनता है। छोटे सेशन सुस्त दिनों में भी चेन बचाए रखते हैं। इस पर विस्तार से वर्कआउट स्ट्रीक में बात की है। FIThim आपकी डे स्ट्रीक दिखाता है और आज का वर्कआउट ख़ुद तैयार कर देता है, जिससे "आख़िर करूँ क्या?" वाला सवाल ही ख़त्म हो जाता है, जो बहुत से लोगों को रोक देता है।

किसी पसंदीदा चीज़ के साथ जोड़ें

पसंदीदा प्लेलिस्ट या पॉडकास्ट जिसे आप सिर्फ़ वर्कआउट के दौरान सुनते हैं, एक छोटा लेकिन असरदार इनाम है।

किसी को बताएँ

किसी दोस्त को अपना प्लान बताना या वीडियो कॉल पर किसी के साथ ट्रेनिंग करना हल्की जवाबदेही जोड़ता है।

क्या न करें

  • ख़ुद को सज़ा न दें। अपराधबोध से शायद ही आदत बनती है; ज़्यादातर उससे बचने की आदत बनती है।
  • छूटे वर्कआउट की "भरपाई" एक बेहद कड़े सेशन से न करें। बस अपना सामान्य प्लान फिर शुरू करें।
  • सोमवार का इंतज़ार न करें। आज के 10 मिनट अगले हफ़्ते शुरू होने वाले परफ़ेक्ट प्लान से बेहतर हैं।
  • सब कुछ एक साथ न बदलें। एक चीज़ बदलें, जैसे समय या वर्कआउट की अवधि, और देखें कि फ़र्क़ पड़ा या नहीं।

जब मन न करना कुछ और हो

कभी-कभी एक्सरसाइज़ का मन न करना सामान्य है। लेकिन अगर आपकी उन ज़्यादातर चीज़ों में दिलचस्पी ख़त्म हो गई है जो पहले अच्छी लगती थीं, दो हफ़्ते या उससे ज़्यादा समय से ज़्यादातर दिन उदासी या निराशा रहती है, या कितनी भी नींद लें थकान बनी रहती है, तो डॉक्टर से बात करें। लो मूड, डिप्रेशन, ख़ून की कमी (एनीमिया), थायरॉइड की समस्या और दूसरी बीमारियाँ एनर्जी और इच्छा दोनों छीन सकती हैं, और इनका सही इलाज होना चाहिए। अगर दर्द या चोट की वजह से ट्रेनिंग बुरी लगती है, तो उसे भी झेलने की बजाय जाँच करवाएँ।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मोटिवेशन न हो तो क्या वर्कआउट करना चाहिए?

आम तौर पर हाँ, लेकिन छोटा। 10 मिनट का सेशन या तेज़ चाल से टहलना आदत को ज़िंदा रखता है। अपवाद: अगर आप बीमार हैं, चोट लगी है या नींद बहुत कम हुई है, तो आराम या हल्की सैर बेहतर विकल्प है।

घर पर वर्कआउट के लिए ख़ुद को मोटिवेट कैसे करें?

शुरुआत को आसान और साफ़ बनाएँ: तय दिन, तय समय, तैयार कपड़े और एक छोटा प्लान जिस पर सोचना न पड़े। मोटिवेशन आम तौर पर काम करने के बाद आता है, पहले नहीं।

क्या वर्कआउट से ब्रेक लेना ठीक है?

हाँ। हल्की गतिविधि वाला एक प्लान किया हुआ हफ़्ता शरीर और दिमाग़ दोनों को रिकवर करने में मदद कर सकता है। बस दोबारा शुरू करने की तारीख़ तय कर लें, ताकि छोटा ब्रेक महीनों में न बदल जाए। छुट्टी वाले दिनों में क्या करें, यह हमारी रेस्ट डे गाइड में है।

एक्सरसाइज़ को आदत बनने में कितना समय लगता है?

यह हर व्यक्ति में काफ़ी अलग होता है और इस पर निर्भर करता है कि रूटीन कितना आसान और नियमित है। हफ़्तों से महीनों तक की उम्मीद रखें, और चिंता न करें अगर कुछ दिन अब भी मेहनत जैसा लगे।